“जन जातीय गौरव – अस्मिता, अस्तित्व एवं विकास” इंदौर के जन जातीय अध्ययन शाला द्वारा आयोजित

“जन जातीय गौरव – अस्मिता, अस्तित्व एवं विकास” इंदौर के जन जातीय अध्ययन शाला द्वारा आयोजित

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के जन जातीय अध्ययनशाला द्वारा आयोजित “जन जातीय गौरव – अस्मिता, अस्तित्व एवं विकास” विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला व्यापक उत्साह और गरिमापूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता माननीय कुलगुरु प्रोफेसर राकेश सिंघई ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में श्री हर्ष चौहान, पूर्व अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, नई दिल्ली तथा विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री प्रज्वल खरे विशेष रूप से उपस्थित रहे। कार्यशाला का उद्देश्य जनजातीय समाज के योगदान, उनके सांस्कृतिक–वैज्ञानिक ज्ञान तथा समसामयिक चुनौतियों पर राष्ट्रीय स्तर पर संवाद स्थापित करना था।
मुख्य वक्ता श्री हर्ष चौहान ने अपने अत्यंत प्रभावी उद्बोधन में जनजातीय समाज की अस्मिता, अस्तित्व और विकास के बहुआयामी पक्षों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह समाज भारत की मूल सांस्कृतिक धरोहर है, जिसकी जीवनशैली प्रकृति के साथ संतुलित सहअस्तित्व का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय नायकों के अमूल्य योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि इतिहास में उनके त्याग को पर्याप्त स्थान नहीं मिला, जबकि अनेक जनजातीय परिवारों ने देश की आज़ादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान विकास मॉडल में जनजातीय समाज के ज्ञान और मूल्यों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
माननीय कुलगुरु प्रोफेसर राकेश सिंघई ने जनजातीय समाज के चिकित्सा ज्ञान, यांत्रिकी क्षमता और मौसम-अनुकूल परिधान चयन जैसी वैज्ञानिक परंपराओं को अपने अनुभवों के आधार पर अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि जनजातीय समुदाय प्रकृति से केवल जुड़ा नहीं है, बल्कि स्वयं प्रकृति का अविभाज्य अंग है। इस समाज का संतुलित, सरल और वैज्ञानिक जीवनदर्शन पूरे मानव समाज के लिए प्रेरणा स्रोत है।
विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री प्रज्वल खरे ने अपने वक्तव्य में जनजातीय समुदाय की कला, शिल्प और सांस्कृतिक धरोहर को आधुनिक बाजार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की पारंपरिक उत्पादकता और सांस्कृतिक रचनाएँ केवल कला नहीं, बल्कि देश की आर्थिक उन्नति में सहायक संसाधन भी हैं। अतः इनके संरक्षण और संवर्धन के साथ-साथ इन्हें रोजगार और उद्यमिता से जोड़ना समय की मांग है।


अध्ययनशाला के विद्यार्थी प्रतिनिधि श्री राजाराम


















