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Home›छत्तीसगढ़›बस्तर की सुंदरता जनजातीय संस्कृति और खनिज संसाधन ही क्षेत्र की पहचान

बस्तर की सुंदरता जनजातीय संस्कृति और खनिज संसाधन ही क्षेत्र की पहचान

By admin
August 4, 2024
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Source By Local TNN

कलेक्टर विजय दयाराम के. ने कहा कि बस्तर की प्राकृतिक सुंदरता-खूबसूरती, जनजातीय संस्कृति और खनिज संसाधन ही हमारे क्षेत्र की पहचान है। साथ ही क्षेत्र में उद्योग स्थापना की अपूर्व संभावना है, शासन प्रशासन की ओर से भी आवश्यक पहल की जा रही है।

मुख्यमंत्री की पहल पर उद्योग विभाग द्वारा उद्योग स्थापना के लिए सिंगल विंडो भी प्रारंभ किया गया है। इसके अलावा उद्योगों और उद्योगपतियों को प्रोत्साहित करने के लिए संभाग मुख्यालय में जीएमडीसी की पदस्थापना किया जा रहा है। उन्होंने वेंडरों को उद्योग स्थापना या व्यापार करने के दौरान यहां की जनता को रोजगार के अवसर देने के साथ-साथ उनके कल्याण का भी ध्यान देने कहा। उन्होंने स्थानीय जनजातिय लोगों को सम्मान जनक जीवन शैली देने की भी पहल करने की बात कही।

कलेक्टर विजय जगदलपुर के एक स्थानीय होटल में एनएमडीसी लिमिटेड द्वारा आयोजित वेंडर मीट कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में उपस्थित वेंडरों से भी उन्होंने बस्तर की चर्चा की। कार्यक्रम में एनएमडीसी के अधिकारी, उद्योग विभाग के अधिकारी, विभिन्न राज्यों, प्रदेश के कई जिलों के वेंडर उपस्थित थे।

बस्तर कला पारंपरिक आदिवासी कला का एक रूप है जिसकी उत्पत्ति भारत के छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में हुई थी। यह एक प्राचीन कला रूप है जिसका अभ्यास सदियों से इस क्षेत्र के स्वदेशी समुदायों द्वारा किया जाता रहा है। बस्तर कला अपनी विशिष्ट शैली और लकड़ी, धातु और मिट्टी जैसी प्राकृतिक सामग्रियों के उपयोग के लिए जानी जाती है।

बस्तर के कारीगर कई तरह की कलाएँ बनाने में कुशल हैं, जिनमें मूर्तियाँ, मूर्तियाँ, मुखौटे और सजावटी वस्तुएँ शामिल हैं। कला में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री स्थानीय जंगलों से प्राप्त की जाती है और इसमें साल की लकड़ी, लोहा, पीतल और बेल धातु जैसी सामग्री शामिल होती है। कारीगर अक्सर स्थानीय रूपांकनों और प्रतीकों को शामिल करते हैं, जैसे कि पारंपरिक दंतेश्वरी मंदिर, पशु, पक्षी और मानव आकृतियाँ।

यह कला न केवल सौंदर्य की दृष्टि से आकर्षक है, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी रखती है। यह स्वदेशी समुदायों की मान्यताओं और परंपराओं से निकटता से जुड़ी हुई है और अक्सर धार्मिक समारोहों और त्योहारों में इसका उपयोग किया जाता है। यह क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के साधन के रूप में भी काम करती है।

बस्तर की कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता और मान्यता मिली है। छत्तीसगढ़ सरकार ने भी इस कला को बढ़ावा देने और समर्थन देने के लिए कदम उठाए हैं, जिससे कलाकारों के लिए आर्थिक अवसर बढ़े हैं और इस अनूठी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को सुनिश्चित करने में मदद मिली है।

बस्तर कला का सांस्कृतिक महत्व

बस्तर क्षेत्र गोंड, मारिया और मुरिया जैसी विभिन्न देशी जनजातियों का घर है, जिनकी सांस्कृतिक विरासत समृद्ध है और उन्होंने अनूठी कला-प्रणाली विकसित की है जो मुख्यधारा की भारतीय कला से अलग है।

बस्तर कला का ऐतिहासिक महत्व इस तथ्य में निहित है कि वे इस क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और जीवन शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये कला रूप पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते रहे हैं और समय और आधुनिकीकरण की कसौटी पर खरे उतरे हैं।

बस्तर की कलाएँ अपनी जटिल शिल्पकला और लकड़ी, लोहा और बेल धातु जैसी प्राकृतिक सामग्रियों के उपयोग के लिए जानी जाती हैं। बस्तर की सबसे प्रसिद्ध कलाओं में धातु शिल्प, लकड़ी की कलाकृतियाँ, टेराकोटा और आदिवासी चित्रकारी शामिल हैं।

बस्तर की कलाओं ने क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, क्योंकि कई कारीगर और शिल्पकार अपनी आजीविका के लिए इन पर निर्भर हैं। मुख्यधारा की कला की दुनिया में भी इन्हें पहचान और लोकप्रियता मिली है, कई कला संग्रहकर्ता और उत्साही लोग इनकी सुंदरता और विशिष्टता की सराहना करते हैं।

बस्तर कला की मांग

अद्वितीय सजावटी वस्तुओं और संग्रहणीय वस्तुओं के रूप में उनकी बढ़ती लोकप्रियता के कारण बस्तर कला की मांग लगातार बढ़ रही है। कई लोग इन हस्तनिर्मित उत्पादों के सांस्कृतिक महत्व और प्रामाणिकता की सराहना करते हैं, क्योंकि वे अक्सर पारंपरिक तकनीकों का उपयोग करके कुशल कारीगरों द्वारा बनाए जाते हैं।

पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ उत्पादों की मांग में वृद्धि हुई है, जिसके कारण बस्तर कला की लोकप्रियता में वृद्धि हुई है। ये उत्पाद अक्सर स्थानीय रूप से प्राप्त सामग्री और पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों का उपयोग करके बनाए जाते हैं, जो उन उपभोक्ताओं को आकर्षित करते हैं जो अपने पर्यावरणीय प्रभाव के प्रति सचेत हैं।

बस्तर कला की मांग बढ़ती रहेगी क्योंकि अधिक से अधिक लोग उनके सांस्कृतिक महत्व, अद्वितीय डिजाइन और पर्यावरण-अनुकूलता के बारे में जागरूक हो रहे हैं।

 

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