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Home›ट्राइबल›भारत में 1 जनवरी 1948 को खरसावां गोलीकांड की तुलना जलियांवाला बाग से

भारत में 1 जनवरी 1948 को खरसावां गोलीकांड की तुलना जलियांवाला बाग से

By admin
January 1, 2024
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Reported By Rajesh Sharma Rairangpur Odisha

झारखंड: आज के ही दिन हुआ था आजाद भारत का 'जलियांवाला कांड' लेकिन 73 साल बाद भी 'जनरल डायर' का पता नहीं . स्वतंत्र भारत में 1 जनवरी 1948 को खरसावां गोलीकांड की तुलना जलियांवाला बाग हत्याकांड से की जाती है। इसी दिन ओडिशा मिलिट्री पुलिस की गोलीबारी में 35 आदिवासियों के मारे की पुष्टि हुई थी।
  • झारखंड में आज के दिन ही हुआ था आजाद भारत का जलियांवाला कांड
  • ओडिशा मिलिट्री पुलिस की गोलीबारी में मारे गए थे 35 आदिवासी
  • एक किताब में 2 हजार से ज्यादा आदिवासियों के मारे जाने का जिक्र
  • खरसावां के ओडिशा में विलय के खिलाफ खोला था आदिवासियों ने मोर्चा

स्वतंत्र भारत में 1 जनवरी 1948 को खरसावां गोलीकांड की तुलना जलियांवाला बाग हत्याकांड से की जाती है। ओडिशा मिलिट्री पुलिस की ओर से की गई गोलीबारी में 35 आदिवासियों के मारे की पुष्टि हुई थी, लेकिन पीके देव की पुस्तक ‘मेमायर ऑफ ए बाइगोर एरा’ में दो हजार से ज्यादा आदिवासियों के मारे जाने का जिक्र है।

कोलकाता से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ‘द स्टेट्समैन’ ने 3 जनवरी 1948 के एक अंक में छापा ‘ 35 आदिवासीज किल्ड इन खरसावां’। हालांकि अभी तक इस गोलीकांड का कोई निश्चित दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इस गोलीकांड की जांच के लिए ट्रिब्यूनल का गठन किया गया, पर आज तक उसकी रिपोर्ट कहा हैं, किसी को नहीं पता। इस गोलीकांड की याद में हर वर्ष एक जनवरी को शहीद सभा का आयोजन होता है और शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।

खरसावां गोलीकांड की वजह
एकीकृत बिहार में खरसावां आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र था, जो उस समय एक रियासत हुआ करता था। देश के तत्कालीन सरदार वल्लभभाई पटेल ने देशी रियासतों को मिलाकर संघात्मक भारत का हिस्सा बनाने के लिए इन रियासतों को तीन श्रेणियों ए, बी और सी में बांटा। ए श्रेणी में भारत की बड़ी रियासतें, बी श्रेणी में मध्यम और सी श्रेणी में छोटी रियासतें थी। खरसावां भी एक छोटी रियासत थी। इस क्षेत्र में उड़िया भाषी लोगों की संख्या को देखते हुए केंद्र के दबाव में मयूरभंज रियासत के साथ-साथ सरायकेला और खरसावां रियासत का ओडिशा में विलय का समझौता हो चुका था, लेकिन खरसावां-सरायकेला के आदिवासी नहीं नहीं चाहते थे सरायकेला और खरसावां का ओडिशा में विलय हो।

उन दिनों से ही आदिवासी अलग झारखंड राज्य की मांग कर रहे थे। 1 जनवरी 1948 को इन तीनों रियासतों के सत्ता का हस्तांतरण भी होना था, लेकिन इसके विरोध में और अलग झारखंड राज्य की मांग कर रहे आदिवासी समाज के 50 हजार लोग खरसावां में एकत्रित हो चुके थे। इस सभा में हिस्सा लेने के लिए जमशेदपुर, रांची, सिमडेगा, खूंटी ,तमाड़, चाईबासा और दूरदराज के इलाके से आदिवासी आंदोलनकारी अपने पारंपरिक हथियारों से लैस होकर खरसावां पहुंचे थे।

आंदोलन के नेतृत्वकर्त्ता जयपाल सिंह मुंडा थे, लेकिन वो खुद उस दिन खरसावां नहीं पहुंचे। दूसरी तरफ ओडिशा सरकार किसी भी हाल में खरसावां में 1 जनवरी को सभा नहीं होने देना चाहती थी और खरसावां हाट उस दिन ओडिशा मिलिट्री पुलिस की छावनी बन गया था। वहीं कोई नेतृत्व नहीं होने के कारण भीड़ का धैर्य जवाब दे चुका था। इसी दौरान अचानक ओडिशा मिलिट्री पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग की।

जयपाल सिंह मुंडा का तत्कालीन भाषण
जयपाल सिंह मुंडा ने सभा में खरसावां नरसहांर को आजाद भारत का जलियांवाला बाग करार दिया । उनके भाषण को ७२ साल बाद भी सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जनरल डायर तो अंग्रेज था जिसने अमृतसर के जलियांवाला बाग में क्रूरता की सारीं हदें पार कर दीं लेकिन आजाद देश के प्रांत ने बेकसूर आदिसवासियों के साथ जो बर्बरता की वो आज भी नाकाबिले माफी है ।

उन्होंने ११ जनवरी को दिए अपने भाषण में कहा ‘जैसे ही फायरिंग खत्म हुई खरसावां बाजार में खून ही खून नजर आ रहा था। लाशें बिछीं थी, घायल तड़प रहे, पानी मांग रहे थे लेकिन ओडिशा प्रसाशन ने ना तो बाजार के अंदर किसी को आने दिया और ना ही यहां से किसी को बाहर जाने की इजाजत दी । घायलों तक मदद भी नहीं पहुंचने दी। आजाद हिन्दुस्तान में ओडिशा ने जालियांवाला बाग कांड कर दिया। यही नहीं नृशंसता की सारी हदें पार करते हुए शाम ढलते ही लाशों को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया । 6 ट्रकों में लाशों को भरकर या तो दफन कर दिया गया या फिर जंगलों में बाघों के खाने के लिए फेंक दिया गया । नदियों की तेज धार में लाशें फेंक दी गई। घायलों के साथ तो और भी बुरा सलूक किया गया, जनवरी की सर्द रात में कराहते लोगों को खुले मैदान में तड़पते छोड़ दिया गया और मांगने पर पानी तक नहीं दिया गया’

बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीबाबू ने लिख दी थी केंद्र को चिट्ठी
बिहार में उस वक्त श्रीकृष्ण सिंह मुख्यमंत्री थे, देश के बड़े नेताओं में शुमार श्रीबाबू ने ओडिशा सरकार की गई इस नृशंस कार्रवाई पर गृहमंत्री पटेल को चिट्ठी लिख कर दखल की मांग की थी। जवाब में पटेल ने भी किसी भी कीमत पर खरसावां का ओडिशा में विलय का विरोध किया।

कौन था खरसावां का जनरल डायर?
इस गोलीकांड को लेकर सात दशक से अधिक समय बीत चुका है, कई जांच कमेटिया भी बनी, लेकिन आज तक इस घटना पर कोई रिपोर्ट नहीं आयी। खरसावां गोलीकांड का जनरल डायर कौन है, 73 साल बाद भी इसका खुलासा नहीं हो पाया है। 1 जनवरी 1948 को क्या हुआ था, किस तरह शहादत दी गई थी उसके सबूत अब तक दस्तावेजों में कैद थे, लेकिन पहली बार ये सबूत सामने आ रहे हैं, हालांकि बिहार सरकार ने इसकी जांच रिपोर्ट भी तैयार की थी लेकिन वो आज तक प्रकाशित नहीं हो सकी।

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